Tuesday, February 8, 2011

जान तक पहुंचे...

आवाज़ धीमी है कैसे खुदा के कान तक पहुंचे,
थोडा ज़ख्म और दे की चीख आसमान तक पहुंचे॥
ये कैसा सफ़र था की रहा रास्ता ही रास्ता,
कांटो पे चले और फ़क़त बियाबान तक पहुंचे॥
वो इश्क नहीं हो सकता जो भुलाने से मिट गया,
मुहब्बत का दर्द वो जो तेरी जान तक पहुंचे॥
अब सोंचता हूँ कोई रूमानी सी नज़्म लिखूं,
थोड़ी सी मसर्रत तो...अवाम तक पहुंचे॥

Saturday, October 16, 2010

प्रेम के मौसम

सूखे मौसम की सुस्ती में,
जब जब धरती जलती है।
मेरी अलसाती आँखों में,
तेरी कितनी यादें पलती हैं।

जब बारिश की रिमझिम में,
भीगी ये दुनिया हंसती है।
मेरी सिलती हुई दीवारें,
तेरी खुशबु को तरसती हैं।

बसंत की मद्धम सर्दी में,
सब बहके बहके लगते हैं।
मेरे अंदर कहीं विरानो में,
चन्दन के वन सुलगते हैं।

शरद की रातों में अक्सर,
प्रेम तड़पता गाता है।
सब दुबके चैन से सोते है,
मेरा चैन तो आता जाता है।

यूँ मौसम बीते, साल गए,
एक दिल फिर भी विराना है.
तू ठहरी न कुछ पल भी वहां,
जहाँ रोज़ का आना जाना है.

Tuesday, September 21, 2010

यादो से अब दिल बहलता नहीं

आ जाओ ज़रा तुम एक बार फ़िर से,यादो से अब दिल बहलता नहीं।
मेरी गली के बच्चे गुमसुम हुए हैं,
पेडो पे झूले भी खाली पड़े हैं॥
नई कलियों में खुशबु उगाये न उगती॥
सुबह शाम हालाँकि माली पड़े हैं॥
वो नुक्कड़ की दादी का सब्जी का थैला,एक शाम भी मुझसे संभलता नहीं।
आ जाओ ज़रा तुम एक बार फ़िर से,यादो से अब दिल बहलता नहीं।
सुबहे तनहा और शामें अकेली।
प्यासे परिंदे रोज़ खिड़की पे उतरें। रात खाने की मेज़ पर तेरे चहेते,
एक साथ बैठते हैं मगर बिखरे बिखरे॥
मैं भी लाता हूँ हर दिन मिठाई के डिब्बे एक बच्चा भी लेकिन मचलता नहीं,
आ जाओ ज़रा तुम एक बार फ़िर से,यादो से अब दिल बहलता नहीं।
गर्द कपड़ो पे मेरे छाने लगी है॥
कंघी और मोजे कल सड़क पे मिले॥
बालकनी में मुरझाती बेली की कलियाँ...
आके पानी में रख दो तो फ़िर से खिले॥
कलेंडर के पन्ने हर दिन पलटता,दिन लेकिन फ़िर भी बदलता नहीं।
आ जाओ ज़रा तुम एक बार फ़िर से,यादो से अब दिल बहलता नहीं।
गुस्सा,नफरत,जलन हिकारत॥
सब नामो से मुहब्बत अब भारी हुई है.
मुझे हक है एक मुआफी का तेरे।
माना मुझसे गलतियाँ सारी हुई हैं॥
वो दिल में जो जमा है अफ़सोस का नमक,दिन रात रोके भी पिघलता नहीं।
आ जाओ ज़रा तुम एक बार फ़िर से,यादो से अब दिल बहलता नहीं।

प्यार के आर पार

प्यार के इस पार हूँ मैं, प्यार के उस पार तुम,

बीच का दरिया है गहरा, न पार मैं न पार तुम ।

प्यार एक चलती सड़क है, इसके कोलाहल को सुन,

उसपे कोई रुकता नहीं, रफ़्तार मैं,रफ़्तार तुम।

प्यार कागज़ पे छपा, प्यार कुछ शब्दों में ग़ुम

कहने को साथ हैं मगर, खबर मैं, अख़बार तुम।

प्यार तलवारों की जंग, जंग की चीखे भी सुन,

प्यार ही घायल है रण में, न जीत मैं, न हार तुम।

प्यार की बोली लगी है, यूँ प्यार के सपने न बुन,

है हस्ती तो आ खरीद ले, बाज़ार मैं, बाज़ार तुम।

प्यार के इस पार हूँ मैं, प्यार के उस पार तुम॥

Saturday, July 24, 2010

थोडा जीवन...

अधूरा सा है सब कुछ...
कोई गहराता अँधेरा हूँ मैं।
दौड़ रहे हैं सबलोग...
जाने क्यूँ ठहरा हूँ मैं॥

क्यूँ जो एक टीस सी है,
दिल से हटती ही नहीं...
पीड़ा की अमरबेल है कोई,
उम्र घटती ही नहीं॥

आंसूं खारे पानी से...
ज्यादा कुछ लगते नहीं,
दिल नमक का दलदल है...
फूल यहाँ उगते नहीं॥

तनहाइयों के दिन बरस,
मिल मिल के पत्थर बन गए...
सपनो के कोरे कागज़ पे,
पसीने रिस के अक्षर बन गए॥

बस एक तलाश है की...
एक हाथ बढ़ के थाम ले,
आंसू आँखों से पोंछ ले,
और शायद मेरा नाम ले...

वैसे महंगा लगता है,
पर सौदा सच में सस्ता है...
इस "शायद" और "सपने" के बीच,
थोडा "जीवन" तो बसता है...

Friday, July 23, 2010

एक कविता निराशा के नाम...

मुझे मुहब्बत है...
हाँ मैं मुहब्बत करता हूँ॥
और इसी में बेबस॥
दिन रात जीता मरता हूँ॥

इस मुहब्बत का हासिल कोई नहीं,
जानता हूँ मैं...
इसके दोगले चरित्र को
पहचानता हूँ मैं॥

साथ इसके चला हूँ,
पहले भी॥
ये बला ख़ुशी तो लाई...मगर॥
फिर वो तन्हाई...हाय तन्हाई...

थका, टूटा, हारा, गिरा,
फिर से पकड़ा उसी रस्सी का सिरा॥
उन्ही रास्तो पे फिर चला,
जाने कितने हादसों में पला॥

टूटे कांच की किरचें
आँखों में धंसी हैं,सपने बिखरे हैं॥
मगर फिर भी एक नए ख्वाब के,
जाने क्यूँ अक्स उभरे हैं..

हाँ, मुहब्बत है मुझे...
उन बेकार जानो से॥
जिन्होंने सुबह देखी नहीं॥
ज़मीं या आसमानों से॥

मुहब्बत मुझे उनसे भी है...
जिनके बेदाग रूह॥
बेस्वाद बिस्तरों पे सज सजके
उकता चुके..पर क्या करें॥

मुहब्बत तो एक फिकरा हैं न॥
भटकती बेचारी जान का॥
बस विरानो में गूंजती आवाज़ है ये॥
न कोई सिलसिला पहचान का॥

और हाँ..कमबख्त मुहब्बत
बिकती भी है॥
कम से कम दामो में॥
हर एक जगह..विरानो में दुकानों में॥

अरे हाँ...किस्सा बीच में ही छूट गया॥
की मुझे मुहब्बत है।
थोड़ी खुद से भी है...
झूठ नहीं बोलूँगा॥

तो! क्या करें...ज़माना पूछता है,,
और मेरे दिल में जैसे कांच सा टूटता है।

कभी सोंचता हूँ..खरीद लूं..
उस बे इमान ज़मीर को चल के॥
जिनके रास्तों में आजकल॥
नए प्यार के चिराग हैं जलते॥

पर क्या करूँ, कायर हूँ मैं
गुज़रे वक़्त की गलियों में भटका,
एक गरीब गुमनाम शायर हूँ मैं...

मेरी मुहब्बत बेकार है...
बीते कल के खाने की तरह॥
मेहमान जो आते हैं कभी,
तो लौट के जाने की तरह...

मगर मैं जानता हूँ,
इस दौर का सच भी पहचानता हूँ।
मुहब्बत तो बस एक खेल है यहाँ,,
जीत का और हार का॥

आंसूं और आँहो का मतलब
समय नए व्यापार का...

ये युग पाखंडी काल छली है॥
हर चेहरे पे है एक चमकीला पर्दा...
हर दिल एक संकरी तंग गली है...





Sunday, June 13, 2010

तन्हाईयां

सहर क्या है, धूप की चुभन,
भाग दौड़, परेशानियाँ...
रात क्या है, यादों की जलन,
वीरानियाँ,वीरानियाँ।

टूटता हूँ, समेटता हूँ॥
फिर से टूट जाता हूँ,
रात-दिन दौड़ता रहता हूँ,
मगर पीछे छूट जाता हूँ.

ये छूटना तकदीर है,
बेकार हैं, हैरानियाँ॥
ये हारना सबक है...
मेहरबानियाँ,मेहरबानियाँ।

घूमता हूँ, शब्-ओ-सहर,
उम्मीदों के पहनके चीथड़े,
ख्वाबों के फूल बासी हैं,
कोई तितली उनपे क्यों उड़े॥

सुबह के हाथ छोटे हैं, मगर
लम्बी हैं,काली परछाईयां,
हर तरफ भीड़ बेशुमार पर,
तन्हाईयां,तन्हाईयां.....