Tuesday, August 23, 2016

किसको मतलब है

तुम सुधरो कि न सुधरो, किसको मतलब है.
कमाओ, मांगो या लूटो, किसको मतलब है.
करो किसी की मदद या बस खुदगर्ज़ी पालो,
अपना बुत ख़ुद लगवा लो, किसको मतलब है.

एक तुम्हारी बात रहे, बाकी सब बकवास,
विरोध करे, उसे उठवा लो, किसको मतलब है.
विनाश के बीज बिखेरो सबके खेतों में,
मीठे फ़ल सारे रखवा लो, किसको मतलब है.

शतरंज की बिछी बिसात, तुम कैसे भी जीतो,
खेल तुम्हारा साफ़ नहीं, किसको मतलब है.
जग भोगो और मिटा दो जो न भोग सको,
सत्ता, शक्ति, धन बोले तो किसको मतलब है.

अहंकार हो अलंकार, छल बल बने तुम्हारा,
तुम पूर्व को पश्चिम बोलो, किसको मतलब है,
अवाम ने वैसे ही रेत पे लिखी फरियादें,
नदी मिटाये, तुम मिटा दो, किसको मतलब है.

Monday, June 6, 2016

तू है मेरे आस-पास

मुझसे कहाँ तू खो गया,
बहुत जागा था शायद,  सो गया. 
लिपट के मुझसे रहता था. 
कहाँ कभी ग़म कहता था.
इस बेपनाह शोर में तू मौन था.
अब समझा है दिल ने, तू कौन था.

लगता है आज भी तू मुझसे लड़ेगा,
मेरे साथ ही घर की सीढ़ियां चढ़ेगा,
परछाइयों के पार तू दुबका हुआ,
मुझपे लपकने को है ठिठका हुआ.
मेरी हंसी की पोटली तू साथ ले गया,
जिसपे फिसलता था, वो हाथ ले गया.

मगर तू है मेरे ही आस-पास,
नहीं मिटा सकता कोई तेरी सुवास.
शाम जैसे ही दरवाज़े पे आती है,
वही कांसी दो आँखें चमक जाती हैं.
मेरी सदाओ में तेरा वजूद है.
मेरे लिए हर वक़्त तू मौज़ूद है. 
 

Monday, February 29, 2016

ख़ामोशियाँ

चली जाती है दुल्हन सी रात...
रफ़्तार में ख़म एक डाले हुए,
मसले फूल चिपकाये दामन से,
ढलका आँचल संभाले हुए

क्या ज़िन्दगी है...वाह!!
रात है, शराब भी और तन्हाई,
फ़िक्र ज़माने की भी नहीं,
न ही अहसास-ए-रुसवाई।
 
सब हासिल है तो फिर क्यूँ ...दो पल का सुकून एक ख़्वाब है?
क्यूँ जिस्मो के करवट लेते हुए...
दिल में उठती एक आग है. 

कभी नयी दुल्हन सी शब,
मुझे देखकर के हंसती है,
कभी ये काली सन्नाटी रात,
नागिन बनके डसती है.

फिर भी कहीं कुछ ज़िंदा है,
जो बार - बार दुहराता है,
तू कल के ग़म आज न पाल,
जो आना है, वो आता है.

कौन जाने अगले पल का सच,
ये जिस्म कल रहे न रहे,
ये रूह ग़म के भंवर में गिरे,
और गहराइयाँ सहे न सहे.

अभी तो निकाल दिल से,
चल निकाल सब मायूसियां,
ये रात जी ले,गुनगुना ले कुछ,
कल तो फिर वही, ख़ामोशियाँ।  

Wednesday, January 6, 2016

दिलासे...

मैं जानता हूँ वो सारे लफ्ज़
दिलासों वाले,
सारे मशहूर नुख्ते और सलाह
लोग देते रहते हैं हर वक़्त मुझे,
ये सब, और कुछ न कुछ नया.
 "अरे, क्यों उदास हो?"
 "क्या हुआ है तुम्हे?"
 "अरे यार, खुश रहा करो..."
 "सब ठीक तो हैं...?"
 "सब अच्छा होगा... देखना"
और हाँ!!
 "भगवान पर भरोसा रखो..."

रखा था मैंने,
भरोसा और हिम्मत,
ख़ुशी और उम्मीद बचाकर
किसी तरह बरसों तलक,
अचार की तरह,
दिल के बंद मर्तबानों में,
नमी और हवा से दूर.

मगर अब देखता हूँ,
जाने कैसे, उन सारी उम्मीदों को,
सीलन लग गयी,
हिम्मत की लकड़ियाँ भी,
दीमक खा चुके हैं.
खोखली बज रही हैं,
ख़ुशी की वो दीवारे भी,
जो बड़ी कोशिशो से, खड़ी की थी.

पता नहीं ये कैसे हुआ?
कब भर गयी उन मर्तबानों में,
इतनी नमी, रेत, गर्द और नमक,
जो सब गला चूका है अब.

बस एक चीज़ अब तक बची है,
साबुत और मज़बूत,
मुंह चिढ़ाती है, सब नमक के सैलाबों को,
सलाह और मश्विरों को.
वो सब हौसले की गप्पो पर,
और प्रार्थना की खुशफहमी पर,
बेशर्मी से हंसती है.

और कहती है,
 "कमबख्त कहीं का...."
 "मैं बस एक ही तेरी सखी यहाँ"
 "अब तो दामन थाम मेरा..."

वो है मेरी दोस्त, उदासी,
कभी नहीं बदली है वो....!!

Wednesday, December 30, 2015

भीड़

"ज़रा चलो मेरे साथ,"
बस...  इतना कहा था मैंने
धीमे से, शराफत से,
और एकदम से,
वो शख्स दूर गया, कुछ बोला सबसे,
और जल्द ही,
सारी भीड़ छंट सी गयी.

फिर कानाफूसी,
घूर के देखने लगी कुछ लड़कियां,
कुछ लड़के आँखे दिखाने लगे।
एक सवाल था सबके चेहरे पर,
"कौन है ये सरफिरा ?"
"कोई गुंडा, पागल?"
"या, रेपिस्ट हुआ तो?"
"कैसे साथ चलने को कह रहा था,"
"कमीना,"

"हाय राम क्या करूँ अब?"
"पुलिस को फोन??"
"या... खुद ही ???"
"नहीं.  ये सेफ नहीं होगा."
"सबसे सेफ है, "
"यहाँ से चुपचाप खिसक लेना."

सब सवाल देख  रहा था मैं,
उन सभ्य लोगों के सहमे चेहरों पर,
और फिर मुझसे नहीं  रहा गया,
छँटती हुई उस भीड़ को देखा,
और आखरी बार चीख कर कहा,
"अरे सुनो तो, साथ चलो मेरे,"
"वहां, सड़क की दूसरी ओर,"
"वहां एक लड़की, अकेली ज़ख़्मी,"
"बेहोश पड़ी है, मदद कर दो प्लीज,"
"उसे अस्पताल ले जाना हैं...."

मगर,
मेरा पहला शराफत वाला प्रयास,
घातक निकला,
भीड़ अब तक काफी दूर जा चुकी थी.
शरीफ लोगों की भीड़.   

Thursday, November 26, 2015

ये वक़्त.....

आँखें तेरी क्यों बुझी सी हैं आजकल?
वो जो हज़ार चिराग करती थी रोशन,
क्यों दिखती है आज दुनिआ भर की थकन, ऊब-
उन पेशानियों पर जिन्हे ख़ुशी कभी खुद चूमती थी?

तेरी हथेलियों को क्या हुआ है?
क्यों ये खुरदरी सी हो गयी है?
कभी इनमे आइने  सी चमक थी,
जिनमे मेरा अक्स दीखता था.

और तेरे होंठ क्यों सूखे, पीले, बेजान से हैं?
इनकी सुर्खी तो शर्मा देती थी फूलो को भी.

ये तुझे क्या हुआ है,
ये मुझे क्या हुआ है,
मैं भी टूटे पत्ते सा क्यों हूँ?

मैं तब भी चाहता था तुझे, और
आज भी तू मेरी ही है.,

मगर वक़्त किसी का सगा नहीं,
किसी से उसको प्यार नहीं,
हमें ये वक़्त मिटाने आया है,
ये प्यार चुराने आया है,

यही वक़्त हमारा रक़ीब है बस,
कोई और कुसूरवार नहीं...

ये वक़्त हमारे प्यार से,
हमारे सामने ही खेलेगा
ये तुझ पे, मुझ पे हँसता है,
ये जान हमारी ले लेगा। ...
 

Wednesday, March 13, 2013

kash...

काश .... कि मेरी सोहबत से,
कुछ तेरा मुकद्दर खिल जाये,
काश की मुझ से खो कर के,
तू खुद से  फिर मिल जाये।

तेरे सुकून की खातिर मैं,
रोज़ फातिहा  पढ़ता रहूँ ,
काश दुआ भूचाल सी हो,
तेरे दर्द का परबत हिल जाये.

तेरे कंधो पर जो हाथ पड़े,
वो हाथ मुहाफ़िज़ हो तेरा,
काश की तुझको जो कोसे,
वो ज़ुबा उसी दम छिल जाये।

नूर तेरे चेहरे से उड़कर,
हर शय को शादाब करे,
काश की तू छू ले जिसको,
वो चाक  ए गरिबा सिल जाये।

मैं चाहे रहूँ , की चाहे मरूं,
तेरी निस्बत की लाज रहे,
काश की बस फिर दर्द न हो,
किसी राह तू फिर न मिल जाये।।

काश…